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Wednesday, 14 October 2015

यात्रा यमुनोत्री और गंगोत्री धाम की - 2

इस प्रकार यमुनोत्री कि यात्रा करने बाद अब हमें गंगोत्री जाना था l जानकीचट्टी से हम सुबह करीब आठ बजे निकले l हमने बारकोट की बस पकड़ी l जिसने करीब साढ़े दस बजे तक हमें बारकोट पहुँचा दिया l हमें वहाँ से तुरंत ही उत्तरकाशी की बस मिल गयी l हम उसपर सवार होकर चल पड़े उत्तरकाशी की तरफ जोकी बारकोट से करीब ८५-९० किलोमीटर है l बस ने करीब २ बजे हमें उतरकाशी पहुँचा दिया l हम जब उत्तरकाशी पहुँचे तो गंगोत्री वाली बस लगी हुई थी l जोकी आधे घंटे बाद २.३० में खुलती l हम उत्तरकाशी आते-आते थकान महसूस करने लगे थे तथा यमुनोत्री में हमें ठंढ ने बहुत परेशान किया था इसलिए हमने उत्तरकाशी में ही रुकने का फैसला किया l वैसे उत्तरकाशी से गंगोत्री कि दुरी १०० किलोमीटर ही है l वहाँ जाकर हम बिरला धर्मशाला में ठहरे  जोकी बस अड्डे के पास ही है l फिर भोजन आदि करके २-३ घंटे आराम करके हम शाम को वहाँ के विश्वनाथ मंदिर गये l  धार्मिक दृष्टि से उत्तरकाशी का महत्व काशी (वाराणसी) के तरह ही है l यहाँ भी विश्वनाथ मंदिर से थोड़ी दूर पर केदार घाट और मणिकर्णिका घाट है l मार्ग की जानकारी के अभाव में उन घाटों पर हम नहीं जा सके l इसके अलावा उत्तरकाशी में नचिकेता ताल भी है l जिसके बारे में ऐसी मान्यता है की आज भी वहाँ नचिकेता आते है l हमने एक स्थानीय व्यक्ति से पूछा तो उसने बतलाया कि पहले इसके लिए १२ किलोमीटर ऑटो से जाना होगा फिर १८ किलोमीटर पैदल इसलिए हमने वहाँ जाने का विचार छोड़ दिया l नचिकेता और यमराज का प्रसिद्द संवाद कठोपनिषद् में वर्णित है l इस प्रकार ४ अक्टूबर की शाम को हम उत्तरकाशी में थे l हम वहाँ काशी विश्वनाथ मंदिर तथा बगल में स्थित हनुमान मंदिर गये l हम काशी विश्वनाथ मंदिर में शाम को ७ बजे होने वाली आरती में शामिल हुए l इसके अलावा मंदिर परिसर में स्थित विशाल और वजनी त्रिशूल के दर्शन किये जिसके बारे में कहा जाता है की इसी से देवी ने महिषासुर का वध किया था l
वहाँ के कुछ फोटो -
इसी त्रिशूल के बारे में ये माना जाता है कि इससे देवी ने महिषासुर का वध किया था l


 त्रिशूल का निचला भाग

रात को वहाँ से होकर भोजन आदि के बाद हम वापस बिरला धर्मशाला में आ गये l अगले दिन हमें गंगोत्री जाना था l वहाँ जाने के बारे में पता किया तो मालुम पड़ा की आजकल तीर्थयात्री कम आ रहे हैं इसलिए कम ही बस वहाँ जा रही है l हमें वहाँ जीप से जाना होगा l अगली सुबह करीब ६ बजे हम गंगोत्री के लिए निकल पड़े l जीप बीच-बीच में रुकते-रुकते जा रही थी l हम भी प्राकृतिक नज़ारे का आनंद लेते हुए करीब पौने ११ बजे गंगोत्री पहुँच गये l यमुनोत्री कि भाँति गंगोत्री में ज्यादा नहीं चलना पड़ता सिर्फ ५०० मीटर कि दुरी पर मंदिर है जहाँ जीप ने हमें उतारा था l प्रस्तुत है उत्तरकाशी से गंगोत्री तक का सफ़र फोटो के माध्यम से -


रास्ते में रुककर चाय पीते हुए

गंगोत्री जाते समय पत्थर गिरने से मार्ग अवरुद्ध हुआ था l लेकिन क्रेन के द्वारा १० मिनट में ही मार्ग को साफ़ कर लिया गया l

ऐसी भयानक और बड़ी चट्टान कई जगह  मौजूद है जो कभी भी गिर सकती है l



यही पर जीप ने हमें उतारा था l

एक विदेशी यात्री






गंगोत्री मंदिर



ये हमारे साथ जीप में उत्तरकाशी से साथ आये थे l ये महाराष्ट्र के थे l इन्होने बतलाया की वे ३५ वर्ष पूर्व चार धाम की यात्रा कर चुके है l इस बार भी चार धाम कि यात्रा पर निकले थे l सबसे पहले ये गंगोत्री आये थे l वापसी में ये हमारे साथ ही गये थे उत्तरकाशी और बिरला धर्मशाला में ही ठहरे थे l ये वहाँ से यमुनोत्री के लिए निकले थे अगले दिन l

यहाँ हमने आलु के पराँठे खाए थे l

चूँकि यमुनोत्री में हमें ठण्ड बर्दास्त से बहर लगी थी अतः हमने गंगोत्री में नहीं रुकने का फैसला किया था l वहाँ करीब डेढ़ दो घंटे रुकने के बाद हम वापस दूसरी जीप से उत्तरकाशी चल दिए थे l वापसी का सफ़र फोटो के माध्यम से -


 अमिताभ और ड्राईवर
 रास्ते में मौजूद सेब के बगान l सेब ४० रुपये किलो मिल रहा था l जीप में मौजूद लगभग सभी ने खरीदी लेकिन मैंने नहीं क्योंकि मुझे सेब ज्यादा पसंद नहीं l





 गंगोत्री से वापस आकर इतना थक गया था की हमें करीब २ घंटे तक उठने की हिम्मत नहीं हुई l

इस प्रकार गंगोत्री धाम के दर्शन कर हम ५ अक्टूबर की शाम को पुनः उत्तरकाशी में थे l थके होने की वजह से हमने अगले दिन भी उत्तरकाशी में रुकने का फैसला किया l अगले दिन यानी ६ अक्टूबर को हमने अपने कपड़े वैगरह साफ किये जोकी सफ़र में काफी गंदे हो गये थे l एक दिन पूर्व गंगोत्री से आकर तो हम काशी विश्वनाथ मंदिर नहीं गये थे थके होने की वजह से लेकिन इस दिन गये थे l एक चीज का अंतर हमें ये नजर इस दिन की आज मंदिर में दर्शनार्थियों की भीड़ ज्यादा थी जबकि दो दिन पूर्व आरती के समय मुश्किल से १५-२० लोग रहे होंगे और उनमें से अधिकाँश यात्री ही थे l हमने इस दिन केदार घाट और मणिकर्णिका घाट जाने का सोचा था इस नाम का घाट काशी में भी है l हमने लोगों से रास्ता पूछा लेकिन शाम होने कि वजह से हमें ठीक रास्ता नहीं मालूम पड़ा और हम मोक्ष घाट पहुँच गये l इस घाट पर अंतिम संस्कार किया जाता है l
मोक्ष घाट के फोटो -


इस फोटो ने हमें चकित किया l क्योंकि पीछे कोई चमकने वाली चीज भी नहीं थी और अँधेरा भी था l 










मोक्ष घाट होकर हम काशी विश्वनाथ मंदिर चल पड़े आरती में शामिल होने l वहाँ से आकर हम सो गये l अगले दिन यानी ७ अक्टूबर को हम सुबह आठ बजे बस से निकल पड़े ऋषिकेश के लिए l वह बस हरिद्वार की थी ऋषिकेश हरिद्वार से पहले ही पड़ता है उत्तरकाशी से जाते समय l उत्तरकाशी से ऋषिकेश की दुरी १७५ किलोमीटर है l बस ने करीब ६ घंटे बाद करीब सवा २ बजे हमें ऋषिकेश बस अड्डे उतार दिया l वहाँ से हम ठहरने के लिए त्रिवेणी घाट आ गये जहाँ मैं पूर्व में २ बार भी आ चूका हूँ l मैं ऋषिकेश के राम झुला, लक्ष्मण झुला, लक्ष्मण झुला से २८ किलोमीटर दूर नीलकंठ महादेव आदि स्थान पहले घूम चूका था l लेकिन अमिताभ का ये पहली बार उत्तराखंड आगमन था इसलिए वह ऋषिकेश आना चाहता था वरना हम सीधे हरिद्वार भी जा सकते थे l   वहाँ त्रिवेणी घाट पर भागवत कथा का आयोजन हो रहा था l वह दोनों दिन सुनने गया था l मैं सिर्फ एक दिन ८ अक्टूबर को यानि अगले दिन गया था उस दिन एकादशी भी थी l उसने कहा की वह लक्ष्मण झुला, गीता भवन जाने कि बजाय भागवत सुनने के लिए वही रहेगा अतः हम ७-८ अक्टूबर को त्रिवेणी घाट पर ही रहे l वहाँ हम एक तमिलनाडु के आश्रम में ठहरे थे l  यहाँ बता दूं कि हमने उत्तरकाशी से ऋषिकेश आते समय कोई तस्वीर नहीं खिंची क्योंकि हम यहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य के अभ्यस्त हो चुके थे l हा शाम को गंगा आरती कि तस्वीर जरुर खिंची -




९ अक्टूबर की सुबह हम हरिद्वार की बस पकड़कर हरिद्वार आ गये और पुनः इस बार भी बजरंग दल के कार्यालय में ठहरे l हम ३ मुख्य जगह गये जो पास में ही थी l सबसे पहले बिल्केश्वर महादेव ये प्राचीन मंदिर है इसके पास में गौरी कुण्ड है l यहाँ के बारे में मान्यता है की माता पार्वती ने शिव को प्राप्त करने लिए तपस्या किया था l इसके बाद माया देवी के मंदिर गये जहाँ के बारे में माना जाता है कि सती ने शारीर त्यागने के पूर्व तपस्या किया था l इसके बाद अंत में गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) जी के आश्रम गये वहाँ राजा भतृहरि की तपस्या स्थली गुफा अभी भी मौजूद है l उनके ही छोटे भाई राजा विक्रमादित्य थे जिन्होंने हर कि पौड़ी का निर्माण हरिद्वार में करवाया था तथा उनके नाम से विक्रम संवत् प्रसिद्द ही है l शाम को हम हर कि पौड़ी गये थे l रात को हमारी ट्रेन थी दून एक्सप्रेस l जिसे अगले दिन रात को सवा नौ बजे रात को गया पहुँचाना था l लेकिन उसने देर से करीब डेढ़ बजे रात को गया पहुँचाया l अभी पितृपक्ष चल रहा था इसलिए स्टेशन पर काफी भीड़ उन लोगों की थी जो अपने पितरों की मुक्ति के लिए पिंडदान करने गया आये थे l गया तो बहुत प्राचीन काल से प्रसिद्द तीर्थ रहा है l मैंने ३ बजे गंगा दामोदर पकड़ी जिसने मुझे सुबह पाँच बजे पटना स्टेशन पहुँचा दिया l इस प्रकार मेरा यमुनोत्री और गंगोत्री का सफ़र पूरा हुआ l